प्रतिभागियों द्वारा मानसा देवी क्षेत्र में भूस्खलन के उपचार और जोखिम न्यूनीकरण को लेकर विस्तार से मंथन किया गया। इस अवसर पर प्रतिभागियों ने वर्तमान में जारी ढाल स्थिरीकरण, भू-अन्वेषण, ड्रिलिंग तथा अन्य तकनीकी कार्यों का स्थलीय निरीक्षण किया और इन कार्यों की प्रगति एवं प्रभावशीलता को समझा। विशेषज्ञों के साथ हुई चर्चाओं में यह बताया गया कि किस प्रकार मौजूदा उपचारात्मक कार्य भूस्खलन के खतरे को कम करने में सहायक हैं तथा आगे किन अतिरिक्त उपायों को अपनाने की आवश्यकता है। साथ ही, दीर्घकालिक दृष्टिकोण से क्षेत्र को सुरक्षित बनाने के लिए वैज्ञानिक, व्यवहारिक एवं स्थल-विशिष्ट उपचार रणनीतियों पर भी विचार-विमर्श किया गया।
इस अवसर पर मनसा देवी की पहाड़ियों के भूस्खलन क्षेत्र की भू-आकृतिक संरचना, ढाल स्थिरता की वर्तमान स्थिति, भूमि उपयोग पैटर्न, जल निकासी व्यवस्था, प्राकृतिक एवं मानवीय प्रेरक कारकों तथा मौजूदा ढाल स्थिरीकरण एवं सुरक्षा उपायों का गहन अवलोकन किया गया। विशेषज्ञों के साथ हुई चर्चाओं में यह स्पष्ट किया गया कि इस प्रकार के स्थल-विशिष्ट क्षेत्रीय अध्ययन किस प्रकार प्रभावी भूस्खलन न्यूनीकरण उपायों, जैसे ढाल स्थिरीकरण कार्य, जल निकासी सुधार, निगरानी एवं चेतावनी प्रणालियों तथा दीर्घकालिक जोखिम न्यूनीकरण रणनीति की योजना एवं डिजाइन में सहायक होते हैं।
सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन ने बताया कि भ्रमण से प्राप्त निष्कर्ष एवं सीख भविष्य में भूस्खलन जोखिम को कम करने, प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों की रक्षा करने तथा संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में मानव जीवन एवं आजीविका की सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु प्रभावी रणनीतियों के निर्माण में सहायक सिद्ध होंगे। इस अवसर पर उत्तराखंड भूस्खलन न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र के निदेशक डॉ. शांतनु सरकार, श्री हाकोन हेयर्डाल, डॉ. जीन-सेबास्टियन लह्यूरू, सुश्री हाइडी हेफ्रे, डॉ. माल्टे फोगे, डॉ. स्पर्शा नागुला तथा डॉ. डोमिनिक लैंग आदि देसी-विदेशी वैज्ञानिक एवं विशेषज्ञ उपस्थित रहे।

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